पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा इस बार दीपेंद्र को नहीं लड़ा रहे चुनाव

पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा इस बार दीपेंद्र को नहीं लड़ा रहे चुनाव

हरियाणा के चुनावी दंगल का मिजाज इस बार कुछ अलग है. बीजेपी ने अबकी बार अपने लक्ष्य व अभियानों से माहौल को आक्रामक बना दिया है. दूसरे दलों को भी खासी मजबूत रणनीति के साथ लड़ना होगा. रण सज चुका है व दलों के योद्धा मैदान में है. लेकिन इस बार कई दलों के ‘युवराज’ मौजूदा मिजाज को देखते हुए सीधे युद्ध नहीं लड़ेंगे. वे रण से बाहर अलग किरदार में रहकर मोर्चा संभालेंगे.

हरियाणा के सियासी घरानों ने अपने इन युवराजों को इस बार विधानसभा के चुनावी समर से दूर ही रखने का निर्णय किया है. ये सभी रण में डटे ‘अपनों’ को चुनाव जितवाने में मदद करेंगे. हरियाणा में कुछ सियासी परिवार ऐसे हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने पॉलिटिक्स सफर को आगे बढ़ा रहे हैं. इन सियासी घरानों की जड़े आज प्रदेश की पॉलिटिक्स में बहुत ज्यादा गहरी है. हर लोकसभा व प्रदेश के विधानसभा चुनावों में इन सियासी परिवारों की अहम किरदार रहती है.

देखा जाए तो हरियाणा गठन यानी 1 नंवबर 1966 से लेकर आज तक के अंतराल में 43 वर्ष 296 दिन तो सिर्फ इन्ही सियासी घरानों ने हरियाणा की सत्ता पर राज किया है. इन्ही परिवारों के हाथ हरियाणा की कमान रही व इन्हीं घरानों के लोग प्रदेश के सीएम बनते रहे. इस विधानसभा चुनाव में भी प्रदेश के ये सियासी परिवार मैदान में तो हैं, मगर इन परिवारों ने मौजूदा माहौल को भांपते हुए अबकी बार अपने ‘युवराजों’ को रण में उतारने से परहेज किया है.

संविधान सभा के मेम्बर व संयुक्त पंजाब में पूर्व मंत्री चौधरी रणबीर सिंह के पोते और पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह के पूर्व सांसद बेटे दीपेंद्र हुड्डा इस चुनाव में एक अलग किरदार में हैं. पिता भूपेंद्र सिंह हुड्डा चाहते थे कि दीपेंद्र यह विधानसभा चुनाव लड़े. लेकिन अंतत: दीपेंद्र हुड्डा को रण से बाहर ही रखने का निर्णय लिया गया.

दरअसल, जाटलैंड यानी रोहतक सीट से तीन बार से लगातार सांसद बनने वाले दीपेंद्र हुड्डा मई 2019 में हुए लोकसभा चुनाव पहली बार में शिकस्त खा गए थे. बीजेपी प्रत्याशी अरविंद शर्मा से दीपेंद्र को मिली पराजय से हुड्डा परिवार सकते में था. परिवार को दूसरा झटका तब लगा जब पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा खुद भी इसी लोकसभा चुनाव में सोनीपत सीट से पराजय गए.

बीजेपी प्रत्याशी रमेश कौशिक ने उन्हें हराया था. पिता-पुत्र की इस पराजय से उनके समर्थक भी स्तब्ध थे. उसके बाद दोनों पिता-पुत्र फिर से इस विधानसभा चुनाव में अगली पारी खेलने का मन बनाए हुए थे. दरअसल, पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा प्रदेश की सियासत में भी अब दीपेंद्र को आगे बढ़ाना चाहते थे.

लेकिन ऐन वक्त पर आकस्मित पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा ने अपने बेटे दीपेंद्र को विधानसभा चुनाव में न उतारने का निर्णय लिया. मगर वे खुद अपनी परंपरागत सीट गढ़ी सांपला किलोई से मैदान में उतर गए. अब हुड्डा चुनाव लड़ रहे हैं व उनके बेटे दीपेंद्र इस चुनाव की कमान संभाले हुए हैं.

देश के पूर्व उप पीएम व हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे ताऊ देवीलाल का सिर्फएक परपोता दुष्यंत चौटाला ही इस बार विधानसभा चुनाव में ताल ठोक रहा है. दुष्यंत उचाना कलां से चुनाव लड़ रहे हैं. उनके तीन अन्य परपोते दिग्विजय चौटाला, करण चौटाला व अर्जुन चौटाला पॉलिटिक्स में पूरी तरह सक्रिय होने के बावजूद इस बार रण से बाहर हैं. इन बच्चों के पिता पूर्व सांसद अजय चौटाला और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला ने अपने इन ‘युवराजों’ को इस बार चुनाव में न उतारने का निर्णय लिया है.

दरअसल, अजय चौटाला के बेटे दिग्विजय चौटाला पहले तो लंबे समय तक विद्यार्थी पॉलिटिक्स में सक्रिय रहे. लेकिन जनवरी 2019 में चौटाला परिवार ने दिग्विजय को जींद उपचुनाव में बतौर प्रत्याशी पहली बार मैदान में उतारा, लेकिन दिग्विजय पराजय गए. करीब चार माह बाद मई 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से दिग्विजय चौटाला को टिकट देकर सोनीपत सीट से चुनाव लड़वाया गया. मगर यह चुनाव भी दिग्विजय पराजय गए. इस बार दिग्विजय चौटाला विधानसभा के दंगल से बाहर हैं. उधर, अभय चौटाला के दोनों बेटे करण व अर्जुन विद्यार्थी पॉलिटिक्स में सक्रिय रहे.

मगर मई 2019 के लोकसभा चुनाव मे पहली बार अर्जुन चौटाला को भी कुरूक्षेत्र से टिकट देकर मैदान में उतारा गया. लेकिन चुनाव के इस कुरूक्षेत्र में अर्जुन पराजय गए. इस बार भी अभय चौटाला अपने दोनों बेटों करण व अर्जुन को विधानसभा चुनाव लड़ाने का विचार कर रहे थे, मगर आखिरी वक्त में अभय ने वर्तमान सियासी दशा देखते हुए अपना यह विचार टालना ही बेहतर समझा. बहरहाल, इस विधानसभा चुनाव में चौटाला परिवार से ताऊ के दो पोते अभय चौटाला व आदित्य चौटाला, एक परपोता दुष्यंत चौटाला व पूर्व सांसद अजय चौटाला की पत्नी नैना चौटाला चुनावी समर में लड़ रहे हैं.

पूर्व सीएम भजन लाल के पोते भव्य बिश्नोई ने भी इस बार विधानसभा चुनाव से दूरी बनाई है. भव्य बिश्नोई भजनलाल के बड़े बेटे विधायक कुलदीप बिश्नोई के पुत्र हैं. कुलदीप ने कांग्रेस पार्टी हाईकमान से अड़कर मई 2019 के लोकसभा चुनाव में भव्य के लिए हिसार से टिकट ली थी. भव्य ने हिसार से बतौर कांग्रेस पार्टी प्रत्याशी चुनाव लड़ा था. लेकिन अपना पहला ही चुनाव भव्य पराजय गए. दीनबंधु सर छोटूराम के नाती राज्यसभा मेम्बर चौधरी बीरेंद्र सिंह के बेटे बीजेपी प्रत्याशी बृजेंद्र सिंह ने भव्य को परास्त किया था.

इस पराजय के बाद भव्य के पिता कुलदीप बिश्नोई हैरत में थे. भव्य को इस विधानसभा चुनाव में फिर से उतारा जाए या नहीं, यह कश्मकश चलती रही, लेकिन अंत में पिता कुलदीप ने भव्य को वैसे चुनाव से दूर रखने का ही फैसला लिया. इस बार कुलदीप ने अपनी पत्नी विधायक रेणुका बिश्नोई को भी चुनावी रण से दूर रखा है. लेकिन अपने छोटे भाई पूर्व उप सीएम चंद्रमोहन बिश्नोई को लंबे अरसे बाद फिर से रण में उतारा है. कुलदीप खुद भी विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं व उनके बेटे भव्य और पत्नी रेणुका ने उनके चुनाव की कमान संभाल रखी है.

कुछ मायूसी भी
इनके अतिरिक्त दो केंद्रीय राज्यमंत्री इसलिए भी मायूस हैं कि वे अपने ‘युवराज’ व ‘राजकुमारी’ को हरियाणा के चुनावी रण में नहीं उतार पाए. दरअसल, केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल गुर्जर अपने बेटे देवेंद्र चौधरी व केंद्रीय राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह अपनी बेटी आरती राव के लिए बीजेपी हाईकमान से टिकट मांगे रहे थे. लेकिन परिवारवाद के पेच की वजह से दोनों मंत्रियों के बच्चों को टिकट नहीं मिल पाई. लेकिन हां, पूर्व मंत्री कैप्टन अजय यादव इस बार कांग्रेस पार्टी हाईकमान से टिकट लेकर अपने युवराज चिरंजीव राव को रेवाड़ी से मैदान में उतारने में सफल रहे. राव चिरंजीव बिहार के पूर्व सीएम लालूप्रसाद यादव के दामाद भी हैं. जबकि कैप्टन खुद इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं.